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देश की धड़कन बन गया था 9.4 रेटिंग वाला 40 साल पुराना शो, सादगी से जीते दिल, पंचायत-गुल्लक को भी करता है फेल

 Written By: Jaya Dwivedie @JDwivedie
 Published : Apr 09, 2026 05:45 am IST,  Updated : Apr 09, 2026 05:45 am IST

दूरदर्शन पर 40 साल पहले एक ऐसा शो आता था जिसके फैंस दीवाने थे। इसे देखने के लिए फैंस सारे काम-काज छोड़ देते थे। इस शो को 9.4 की रेटिंग मिली है और आज के दौर में इसकी तुलना 'पंचायत' और 'गुल्लक' जैसे शोज से होती है।

Malgudi Days- India TV Hindi
शो से लिया गया एक शॉट। Image Source : IMDB

आज के डिजिटल युग में जहां ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर अपराध, हिंसा और सस्पेंस वाली वेब सीरीज की भरमार है, वहीं 'पंचायत' और 'गुल्लक' जैसी सादगी भरी कहानियों ने दर्शकों को अपनी जड़ों की याद दिलाई है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि सादगी का यह 'मास्टरपीस' भारतीय टेलीविजन पर करीब 40 साल पहले ही रचा जा चुका था? हम बात कर रहे हैं धारावाहिक 'मालगुड़ी डेज' की, जिसने 80 के दशक में बिना किसी तड़क-भड़क के हर भारतीय घर में अपनी जगह बना ली थी। यह शो मशहूर लेखक आरके नारायण की कहानियों पर आधारित था, जिसे दिग्गज निर्देशक शंकर नाग ने पर्दे पर उतारा था।

ओटीटी के दौर में भी कायम है 'मालगुड़ी' का जादू

लगभग चार दशक पहले जब टेलीविजन मनोरंजन का एकमात्र साधन था तब 'मालगुड़ी डेज' ने पारिवारिक मूल्यों और रिश्तों को बेहद सहज तरीके से पेश किया। इसमें न तो कोई भारी-भरकम ड्रामा था और न ही आज के दौर जैसी हिंसा, फिर भी इसकी लोकप्रियता आज की किसी भी सुपरहिट वेब सीरीज से कहीं ज्यादा रही। इस शो की सबसे बड़ी खूबी इसकी छोटी लेकिन प्रभावशाली कहानियां थीं। हर एपिसोड अपने आप में एक संपूर्ण संसार समेटे हुए था, जो दर्शकों को जीवन का कोई न कोई गहरा सबक दे जाता था। यही कारण है कि यह शो बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर पीढ़ी का पसंदीदा बन गया।

सीमित एपिसोड्स और ऐतिहासिक IMDb रेटिंग

उस दौर में जब 'डेली सोप्स' यानी कभी न खत्म होने वाले धारावाहिकों का चलन शुरू हो रहा था, 'मालगुड़ी डेज' ने केवल 50 के करीब एपिसोड्स में अपनी पूरी बात कह दी। सीमित बजट और संसाधनों के बावजूद इसके कंटेंट की मजबूती ने इसे एक ऐतिहासिक उपलब्धि दिला दी। आज भी 9.4 की IMDb रेटिंग के साथ यह दुनिया की सबसे बेहतरीन टीवी सीरीज में शुमार है। 1986 में पहली बार प्रसारित हुए इस शो ने न केवल दर्शकों का दिल जीता, बल्कि आलोचकों की भी खूब सराहना बटोरी। इसकी कहानियां पूरी तरह से भारतीय मिट्टी से जुड़ी थीं, जिसमें स्कूल की शरारतें, दोस्ती, गांव की जिंदगी और नैतिक मूल्यों का अद्भुत संगम था।

स्वामी की मासूमियत और अरसलु स्टेशन की पहचान

शो के किरदारों ने दर्शकों पर ऐसी छाप छोड़ी कि वे आज भी जीवंत लगते हैं। विशेष रूप से मास्टर मंजूनाथ द्वारा निभाया गया 'स्वामी' का किरदार घर-घर में लोकप्रिय हो गया। स्वामी की मासूमियत, उसकी छोटी-छोटी शरारतें और अपने दादा-दादी व दोस्तों के साथ उसका जुड़ाव हर किसी को भावुक कर देता था। इस शो का प्रभाव इतना गहरा था कि कर्नाटक के अरसलु रेलवे स्टेशन को लोग आज भी प्यार से मालगुड़ी रेलवे स्टेशन कहते हैं। यह स्टेशन आज भी इस कालजयी शो के प्रशंसकों के लिए एक तीर्थ स्थल जैसा है, जहां लोग उस दौर की यादें ताजा करने आते हैं।

शंकर नाग का विजन और आधुनिक उपलब्धता

इस मास्टरपीस के पीछे असल दिमाग दिग्गज अभिनेता-निर्देशक शंकर नाग का था। उन्होंने इसके पहले तीन सीजनों का निर्देशन खुद किया और चौथे सीजन में कविता लंकेश के साथ मिलकर शो की आत्मा को बरकरार रखा। कुल चार सीजनों में फैली यह सीरीज आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती है जितनी 80 के दशक में थी। नई पीढ़ी के दर्शक जो आज के शोर-शराबे वाले कंटेंट से ऊब चुके हैं, वे इस अद्भुत शो का अनुभव ओटीटी प्लेटफॉर्म अमेजन प्राइम वीडियो पर कर सकते हैं। यह शो हमें याद दिलाता है कि बेहतरीन कहानी कहने के लिए महंगे स्पेशल इफेक्ट्स की नहीं, बल्कि सच्ची भावनाओं और सादगी की जरूरत होती है।

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415 एपिसोड्स वाला 36 साल पुराना शो, 8.8 है IMDb रेटिंग, दर्शकों से हर हफ्ते आती थीं लाखों चिट्ठियां

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